Saturday, December 15, 2018

बिचौलिया - सुरेंद्र मोहन पाठक

दिसंबर 4 2018  से दिसंबर 13 2018 के बीच पढ़ी गई

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट: पेपरबैक
पृष्ठ संख्या: 368
प्रकाशक: राजा पॉकेट बुक्स
श्रृंखला: सुनील #116
बिचौलिया - सुरेंद्र मोहन पाठक
बिचौलिया - सुरेंद्र मोहन पाठक
पहला वाक्य:
कॉल बेल बजी।

अटवाल परिवार के ऊपर मानो मुसीबत का पहाड़ सा टूट पड़ा था। अदिति अटवाल अपनी इसी परेशानी का हल निकलवाने की उम्मीद से सुनील के पास आई थी। अदिति के पिता,सुदर्शन अटवाल, रमाकांत को जानते थे और इसी कारण अदिति पहले रमाकांत और उसके कहने पर आखिरकार सुनील के पास आई थी।

अटवाल परिवार की परेशानी का सबब शिव हरि जालान था। वह कभी सुदर्शन अटवाल का दोस्त हुआ करता था जिससे सुदर्शन अटवाल ने अपने ग़ुरबत के दौर में कुछ पैसा उधार लिया था। उसी पैसे से सुदर्शन अटवाल ने अपना व्यापार खड़ा किया था। अब जालान का कहना था कि चूँकि पैसे उस वक्त उसने दिए थे तो उसका भी व्यापार में हिस्सा था और उसे वो हिस्सा चाहिये था। उसकी अटवाल परिवार को धमकी थी कि अगर ऐसा न हुआ तो वह एक ऐसी बात जगजाहिर कर देगा जिससे अटवाल परिवार की इज्जत तो मिटटी में मिल ही जाएगी साथ में उनकी दौलत भी जब्त हो जाएगी। जालान के मुताबिक अब उनकी भलाई इसी में थी कि वो रकम अदा कर दें।

अदिति ने यह बात अभी तक सुदर्शन अटवाल से छुपाकर रखी थी। अपने पिता की तबियत खराब होने के कारण उन्हें इस मुद्दे से अदिति से दूर ही रखा था। उसे खुद ही इस मुसीबत का हल ढूँढना था।

चेतन चानना एक प्राइवेट जासूस था जो इस सौदे में बिचौलिये का किरदार निभाने वाला था। चानना का काम यह सुनिश्चित करना था कि जालान और अटवाल के बीच हुई ये सौदेबाजी इमानदारी से हो और एक बार पैसा मिलने के बाद ब्लैक मेलिंग का यह सिलसिला हमेशा हमेशा के लिए खत्म हो जाये।

अदिति यह नहीं चाहती थी कि वो इस ब्लैक मेल के आगे घुटने टेके और इस कारण सुनील उसकी आखिरी उम्मीद था।

आखिर जालान के पास ऐसा क्या था जिसने अटवाल परिवार को तिगनी का नाच नचा दिया था? क्यों अदिति और उसके परिवार के बाकी लोग पुलिस के पास नहीं जा रहे थे? आखिर बिचौलिया इस सौदे में क्यों मुकर्रर किया गया था?

यही सब प्रश्न सुनील के मन में उमड़ घुमड़ रहे थे। और उसने अदिति की मदद करने का फैसला कर लिया था। लेकिन फिर एक कत्ल हो गया और पहले से पेचीदा मुद्दा और पेचीदा हो गया।

अब सुनील को इस  बात की जड़ तक पहुँचना ही था क्योंकि किसी की जान का सवाल था।

क्या सुनील बात की जड़ तक पहुँच पाया? क्या वह अटवाल खानदान को इस मुसीबात से निजाद दिला पाया? आखिर कत्ल किसका हुआ था और क्यों?

इन सब प्रश्नों के उत्तर आपको इस उपन्यास को पढ़ने के पश्चात ही मिलेंगे।

Tuesday, December 11, 2018

8:36

9 नवंबर से 10 नवंबर के बीच पढ़ी गई

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट: पेपरबैक
पृष्ठ संख्या: 48
प्रकाशक: राज कॉमिक्स
आईएसबीएन: 9789332415591


8:36
8:36

बहुत दिनों से कोई कॉमिक नहीं पढ़ा था। इस रविवार मामाजी के घर जाना हुआ तो एक कॉमिक उनसे ले आया। वो कॉमिक के बड़े शौक़ीन हैं और मैं जब बचपन में गढ़वाल से सर्दियों की छुट्टियों में आता था उनकी कॉमिक का संग्रह से कॉमिक पढ़ने की तमन्ना मन के किसी कोने में हमेशा रहती थी। काफी सारी कॉमिक मैंने उस वक्त पढ़ी थीं।

खैर, बचपन की याद से आज के समय में आते हैं। उनके पास से  डोगा की 8:36 लेकर आया। वैसे तो उन्होंने चुनने के लिए दो तीन कॉमिक दी थी लेकिन बाकियों के साथ दिक्कत ये थी कि वो भाग में थी और उनका दूसरे या किसी मामले में पहला भाग उनके पास नहीं था। ऐसे में उन्हें लेकर कोई तुक  नहीं था। एकल कॉमिक या उपन्यास हमेशा से मेरी पहली पंसद रहे हैं। अगर कहानी एक में ही खत्म हो जाए तो फिर आप आगे बढ़ सकते हैं वरना आपको भागों के चक्कर में यहाँ वहाँ फिरना पड़ता है और आप यह गाना गुनगुनाने में मजबूर हो जाते हैं:

फिरता रहूँ मैं दर बरदर,
मिलता नहीं तेरा निशां,
होके जुदा कब मैं जिया
तू हे कहाँ मैं कहाँ


राज कॉमिक के मामले में मैंने कई बार ये गाना गाया है। और मेरा ये करने का फिलहाल कोई इरादा नहीं था इसलिए 8:36 बेहतर चुनाव था।

अब 8:36 की बात करें तो इस कॉमिक में एक नहीं दो सम्पूर्ण कहानियाँ हैं। यानी इस 48 पृष्ठों के कॉमिक में दो कॉमिक हैं। इस पोस्ट में दोनों के विषय में बात करूँगा।

Wednesday, December 5, 2018

द ज़िन्दगी - अंकुर मिश्रा

किताब नवम्बर 25,2018 से नवम्बर 29,2018 के बीच पढ़ी गई

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट: पेपरबैक
पृष्ठ संख्या: 90
प्रकाशक: सूरज पॉकेट बुक्स
आईएसबीएन: 9789388094085

द ज़िन्दगी - अंकुर मिश्रा
द ज़िन्दगी - अंकुर मिश्रा


द ज़िन्दगी अंकुर मिश्रा जी की कहानियों का संग्रह है। यह  अंकुर जी की पहली किताब हैं। 'द ज़िन्दगी' को दो भागों में बाँटा गया है। पहले भाग में 6 कहानियाँ हैं और दूसरे भाग में 10 लघु-कथाएँ हैं। हर कहानी से पहले एक कविता है जो कि उस कहानी के विषय के प्रति इशारा कर देती है।

किताब का नाम और आवरण किताब में मौजूद सामग्री के विषय में काफी कुछ कह जाता है। अक्सर कहानी संग्रह का शीर्षक संग्रह में मौजूद किसी कहानी का शीर्षक ही होता है। मैंने तो अब तक ज्यादातर यही देखा है परन्तु इस कहानी संग्रह के मामले में ऐसा नहीं है। इस किताब में ज़िन्दगी के विभिन्न पहलुओं को दर्शाते किस्से और कहानियाँ हैं। कुछ में सुख है तो कुछ में दुःख है और इस तरह ज़िन्दगी का हर स्वाद इन्हें पढ़ते हुए मिलता है। यही चीज किताब के आवरण को देखने पर भी पता चलती  है।

आवरण में शहरी जीवन और ट्रैफिक जाम दिख रहा है।  दफ्तरी कागजातों की बारिश में भीग रहा एक आदमी दिख रहा है। शहर को देखते और एक दूसरे का हाथ थामे एक नवयुगल दिख रहा है जो शहर को ताक रहा है। वो साथ मिलकर शहर से लड़कर अपनी ज़िन्दगी सँवारने की जद्दोजहद करने के लिए तैयार होते से प्रतीत होते हैं।
यह तो हुई बाहरी साज सज्जा की बात। अब किताब की सामग्री की बात करते है।

भाग एक में  निम्न कहानियाँ  हैं।

1) अभी ज़िंदा हूँ मैं

पहला वाक्य:
आज ऑफिस से निकलते-निकलते नीलेश को फिर देर हो गई।

आज के आधुनिक जीवन में हम अपनी सम्वेदनाएँ खोते जा रहे हैं। ऑफिस और जीवन की चक्की में आदमी इतना पिस जाता है कि उसकी आम इनसानी संवेदनशीलता निचुड़ सी जाती है। बचा रहता है तो केवल एक रोबोट जो इनसान खाली घर के चौखट के अन्दर आने पर ही बनता है। अपनी इनसानियत को बचाने की जद्दोजहद ही इस कहानी में दिखती है। कहानी मुझे पंसद आई।


2) लाल महत्वाकांक्षाएं

पहला वाक्य:
उसने अपनी छोटी-छोटी आँखें खोली।

जैसे जैसे उपभोगता वाद बढ़ा है हमारी इच्छाएं भी बड़ी है। हम हर चीज पाना चाहते हैं। इसी दौड़ में हम लगे हुए है और दौड़ते दौड़ते इतने आगे निकल जाते हैं कि हमारे लिए जो जरूरी है उसकी भी आहुति दे देते हैं। इस बात को यह कहानी बाखूबी दर्शाती है।

इसके अलावा आजकल एकल परिवार का चलन भी बढ़ा है। पहले परिवार में लोग साथ रहते थे तो  एक दूसरे की मदद हो जाती थी लेकिन एकल परिवार ने दम्पति को अकेला अलग थलक कर दिया है। यह बात भी इस कहानी से दृष्टिगोचर होती है।

यह कहानी भी मुझे पसंद आई। किरदार जीवंत हैं और अपने में या अपने आस पास अगर हम देखें तो ये किरदार हमे आसानी से दिख जायेंगे।

3) इश्क ऐसा भी

पहला वाक्य:
मैं आज फिर लड़खड़ाता, बोतल में डूबता उतरता, कोठे नम्बर 117 के कमरा नम्बर 23 पर पहुँचा और ज़ोर-ज़ोर से दरवाज़ा खटखटाने लगा।

इश्क को अक्सर हम खांचों में बाँध देते हैं लेकिन इसके अनेक रूप हैं। इश्क के ऐसे ही रूप को इस कहानी में देखा जा सकता है।

कहानी में कॉलेज का लड़कपन का हिस्सा भी आता है जो कि रोचक है। यह रोमांचक है लेकिन कहानी के बीच में अटपटा लगता है। यह इसलिए भी ज्यादा अलग लगता है क्योंकि दोनों हिस्सों की टोनालिटी एकदम अलहदा है। कॉलेज वाला किस्सा जहाँ रोमांचक है वहीं वर्तमान का किस्से में दर्द ज्यादा है।

इसके अतिरिक्त पहले मुझे समझ नहीं आया कि मुख्य किरदार एक ही लड़की के पास क्यों जाता था? लेकिन शायद वह भी इश्क में था।

Friday, November 30, 2018

दुष्कर - महाश्वेता देवी

उपन्यास नवम्बर 16,2018 से नवम्बर 25,2018 के बीच पढ़ा गया

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट: पेपरबैक
पृष्ठ संख्या: 120
प्रकाशक: वाणी प्रकाशन
अनुवाद : सुशील गुप्ता
मूल भाषा : बांग्ला



दुष्कर - महाश्वेता देवी
दुष्कर - महाश्वेता देवी


पहला वाक्य:
'बनारस से चली हुई ट्रेन, आखिरकार पहुँच ही गई।'

आज पूवाली वापस इस शहर में आ गई थी। यहाँ इस शहर में उसका कोई नहीं था पर फिर भी बनारस में अपने मंझले जीजा के यहाँ से कोलकत्ता वापस जाते हुए वो पिछले दो सालों से इधर रुका करती थी। पर आज का रुकना उन सबसे अलग था। आज वह रुकेगी और फिर रुकने के बाद जब कलकत्ता के लिए निकलेगी तो कभी लौटकर इस शहर में नहीं आएगी।

उसने यह फैसला कर लिया था। वह अपने इस फैसले से दुखी थी। लेकिन यही उसके और सत्येश के लिए ठीक था। दोनों ने मिलकर इस दुष्कर निर्णय को लिया था।

आखिर कौन थी पूवाली? क्यों वो इस अनजान शहर में आती थी? सत्येश कौन था?

इन सब प्रश्नों के उत्तर आपको इस उपन्यास को पढ़कर ही मिलेंगे।

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