हिंदी लोकप्रिय साहित्य की बात की जाए तो शब्दगाथा मीडिया पब्लिशर लोकप्रिय साहित्य के क्षेत्र में तेजी से उभरते प्रकाशन के रूप में सामने आया है। प्रकाशन की शुरुआत परवेज क़ैसर खान और सबा खान की जोड़ी ने मिलकर की है। कुछ ही समय में इस जोड़ी ने पाठकों को बेहतरीन गुणवत्ता वाला मनोरंजक साहित्य प्रदान किया है। यही कारण है कि शब्दगाथा से प्रकाशित होने वाली पुस्तकों का पाठकों को इंतजार रहता है।
एक बुक जर्नल पर हमने शब्दगाथा मीडिया पब्लिशर के प्रबंध निदेशक और सीईओ परवेज क़ैसर खान से बातचीत की है। इस बातचीत में हमने उनकी अब तक की यात्रा को और भविष्य के लक्ष्यों को जानने की कोशिश है। उम्मीद है यह बातचीत आपको पसंद आएगी।
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नमस्कार परवेज जी, अपने विषय में कुछ बताएँ। आप कहाँ से हैं? शिक्षा दीक्षा कहाँ हुई? फिलहाल कहाँ रह रहे हैं?
उत्तर: नमस्कार विकास जी। अपने विषय में ज्यादा कुछ ख़ास तो है नहीं बताने को, फिर भी आप ने पूछा ही है तो मूलतः मेरी जड़ें उत्तर प्रदेश के बहराइच जनपद से जुड़ी हैं। अलबत्ता वहाँ सिर्फ एक डेढ़ साल ही रहना हो पाया। बचपन प्रदेश के विभिन्न जनपदों में पिताजी के ट्रांसफ़र के चलते भटकते ही गुजरा। विभिन्न शहरों के स्कूलों से पढ़ते हुए दसवीं, बारहवीं लखीमपुर खीरी, फिर विज्ञान से स्नातक लखनऊ, तदुपरांत विज्ञान में स्नातकोत्तर पुणे से किया। फ़िलहाल जिंदगी की जद्दोजहद भी अध्यापन से कॉर्पोरेट, फिर वहाँ से नवी मुंबई में कोचिंग के स्व व्यवसाय तक खींच लाई। तो अभी नवी मुंबई ही मेरा वर्तमान ठिकाना है।
साहित्य से जुड़ाव कब हुआ? वह कौन से लेखक थे जिन्होंने साहित्य की दुनिया में कदम रखवाया और शब्दों के प्रति आपके शौक को पोषित किया?
उत्तर: इसकी भी कोई नई कहानी नहीं है। एक तरह से देखा जाए तो ये विरासत में मिला शौक़ है। दादा जी, फिर पिताजी से होते हुए ये मुझ तक आया। यहाँ हैरत की बात ये है कि हम पाँच भाई-बहनों में सिर्फ मुझी में ये शौक़ आ पाया। अफ़सोस इस बात का है कि दादा जी का सानिध्य नहीं मिल सका। बस कोई सात-आठ साल का रहा होऊँगा, तब पहली बार मिला था। तमाम उर्दू की किताबें उनके कुतुबखाने (पुस्तकालय) में मौजूद थीं। घनघोर पढ़ाकू थे दादा जी। फिर सीधे बारहवीं की परीक्षाओं के बाद मिलना हुआ। क़ुतुब खाना तब भी मौजूद था और दादा जी से तब चर्चा भी हुई थी किताबों पर क्योंकि तब तक मेरा साहित्य से अच्छा-ख़ासा परिचय हो चुका था। हाँ, उर्दू पढ़ना न आया कभी। इसलिए उनके पुस्तकालय में मौजूद किताबों से परिचय न हो पाया।
पिताजी तमाम साहित्यिक पत्रिकाएँ मँगवाया करते थे। उनके पास भी तमाम किताबें थीं। उपन्यास, कहानियाँ कम थीं। ज्यादातर गंभीर विषयों पर आधारित किताबें थीं। कुछेक पढ़ने की कोशिश कीं भी, मगर बहुत ज्यादा घुसता नहीं था तब दिमाग में। हाँ पत्रिकाओं में छपी कहानियाँ जरूर पढ़ता था। आठवीं में कॉमिक्स पढ़ने के दौरान दुकान पर एक उपन्यास दिखा ‘गैंगवार’। पाठक साहब (सुरेन्द्र मोहन पाठक) से परिचय था वो और लोकप्रिय साहित्य से भी। उसके बाद पढ़ने का असल चस्का लगा था। फिर पढ़ने के मामले में रुकना ना हुआ। फिर साहित्य भी समझा, गंभीर किताबें भी समझीं। आज भी पढ़ता ही रहता हूँ। उस दरम्यान लिखा भी जो उस समय की खूबसूरत अंदाज़, रूप की शोभा जैसी पत्रिकाओं में छपी भीं। कुछेक कविताएँ भी लिखीं जो कादम्बिनी जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका में छपी थीं। खूबसूरत अंदाज़ में छपने वाली कहानियों का मेयार बदलने के बाद लिखना भी बंद कर दिया। पहले वो पत्रिका लोकप्रिय साहित्य की विधा में किस्से कहानियाँ छाप रही थी, मगर फिर उसने खुद को ड्रामा और रोमांस तक ही सीमित कर लिया। तो फिर नहीं लिखा आगे।
आपने जो पत्रिकाओं के लिए लिखा क्या उसे पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करने का इरादा है? कभी प्रकाशित करके या प्रकाशन की वेबसाईट पर प्रकाशित करके?
उन्हें सहेज नहीं पाया कभी। या फिर कहूं थोड़ी लापरवाही हुई। फाइल्स, पुरानी मैगजीन, सब पड़ी रहीं, सब पर वक्त की मार पड़ गई, कुछ लोग उठा ले गए।
'अपने अपने दायरे', 'शबनम', 'स्याह दायरे', 'शैरीन' आदि बहुत प्रशंसित कहानियाँ थीं मेरी।
हाँ, ये संभव है कि हू ब हू ना सही, मगर ९५% पुनर्लेखन कर सकता हूँ।
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पूरा साक्षात्कार एक बुक जर्नल के नवीन ठिकाने पर
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