गजानन रैना साहित्यानुरागी हैं। समय समय पर सोशल मीडिया पर साहित्यिक कृतियों पर अपने खास अंदाज में टिप्पणी करते रहते हैं। आज पढ़िए शम्सुर्रहमान फारुकी के प्रसिद्ध उपन्यास कई चाँद थे सरे-आसमां पर लिखी उनकी यह संक्षिप्त टिप्पणी।
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कई चाँद थे सरे आसमाँ , कि चमक चमक के पलट गए,
न लहू मेरे ही ज़िगर में था , न तुम्हारी ज़ुल्फ़ सियाह थी।
अगर आपने ओरहान पामुक की 'माय नेम इज रेड' पढी हो तो आपने एक बार तो जरूर सोचा होगा कि काश, साठ भाषाओं में अनुवादित इस शाहकार के मुकाबले की चीज हमारे यहाँ भी लिखी गयी होती।
खुश हो जाइए, उर्दू के डेमी गाड (अब स्व.) शम्सुर्रहमान फारुकी साहब की 'कई चाँद थे सरे-आसमाँ' ऐन आपकी ख्वाहिश के मुताबिक किताब है। फारुकी साहब के पास एक प्रखर शोधकर्ता के तथ्य हैं, एक प्रामाणिक इतिहासवेत्ता की जानकारियाँ हैं, एक कवि का सौंदर्यबोध है और है एक उस्ताद किस्सागो का अंदाजे बयां।
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पूरा लेख पढ़ें एक बुक जर्नल के नवीन ठिकाने पर:
पुस्तक विवरण:
नाम: कई चाँद थे सरे-आसमाँ | लेखक: शम्सुर्रहमान फारुकी | प्रकाशक: पेनगुईन बुक्स इंडिया | पुस्तक लिंक: अमेज़न
टिप्पणीकार परिचय
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| गजानन रैना |
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मेरे द्वारा पढ़े गए अब तक के उपन्यासो में सबसे बोरिंग एवं बेकार यही नॉवेल रहा..... 😌😌😌😌😌😌😌😌😌😌
ReplyDeleteओह!! ऐसा क्यों??
Deleteपता नहीं क्यों... शायद शुरुआत ही ऐसी है 😌😌😌😌😌😌😌
ReplyDeleteचलिए कोई नहीं...हर किताब किसी के लिए नहीं होती...
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